Sunday, August 23, 2015

तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो ... ~Fundamental confusion of the Indian youth

तुम हो... कुछ हो!
दरिया है तुम्हारे अंदर, साँसों में तूफ़ान है,
खून खौलता लावा, मर-मस्तिष्क में बवाल है!
भवंडर हैं कदम कदम पर और खुद ही से जूझते हो?
क्यों  किसी की विचार-धाराओं में अस्तित्व अपना ढूँढ़ते  हो?
क्रांति क्रांति चिल्लाते हो...
शांति की आशा भी रखते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!

किसने बेड़ियाँ बाँधी तुम पे, तुमने और कितनों पे बाँधी?
संस्कृति की बातें सुनायीं बहुत, और सभ्यता पे रोक लगायी?
बदलाव की बातें करते हो, कहाँ जा कर बसते हो!
कौनसी सत्ता, कैसे नारे, किसको दिनभर कोसते हो?
गंदगी में पैर रखते हो...
फिर पैर को साफ करते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!

कौन गुरु, कपटी कौन, कौन भगवान ज्ञात नहीं!
रखना तो है किसी पे विश्वास, फिर आत्मविश्वास क्यों नहीं!
है इन्सानियत इतनी दुर्लभ, कि जिसने दिखाई भगवान है,
बाकी या तो बेरहम, या बेरहमी से परेशान हैं!
डर पैदा करते हो...
उसी डर से रुक जाते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!



















(The author does not own copyright of any picture. Pic courtesy:internet)

16 comments:

  1. बहुत बढ़िया। काव्य शैली बहुत यथार्थवादी होने के साथ साथ मधुर भी है। ऐसा कम देखने को मिलता है। लिखते रहिये। शुभकामनाएं।

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  2. बहुत बढ़िया। काव्य शैली बहुत यथार्थवादी होने के साथ साथ मधुर भी है। ऐसा कम देखने को मिलता है। लिखते रहिये। शुभकामनाएं।

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  3. बहुत बढ़िया। काव्य शैली बहुत यथार्थवादी होने के साथ साथ मधुर भी है। ऐसा कम देखने को मिलता है। लिखते रहिये। शुभकामनाएं।

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  4. धन्यवाद सतीश जी| प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया!

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  5. दिल से लिखने बाली कबिता ऐसी ही होती है ।ये बिलकुल नये एहसास जैसा है और सार्थक भी इस बक्त के घटनाक्रम पर है ।
    आपकी हिम्मत और जोश बिलकुल क्रांतिकारी जैसा है । सुक्रिया क्रांतिकारिता ,के लिए ।

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  6. क्रांतिकारियों पर लिखने बालो की कमी आज कल दिखती है ।

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  7. क्रांतिकारियों पर लिखने बालो की कमी आज कल दिखती है ।

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  8. शुक्रिया Amik ji...:)

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  9. The inspirational factor in your writing is the way you use bare minimum words to convey a critical thought. Clear summarization of the discordance in mind and actions of the young. I relished that line that speaks about the desperation to seek one's self in the idealogies of others. Prompts me to believe that the greatest inspiration is always the one that comes from within, pushing limits a bit harder each day.

    Great writing as always! It was a pleasure reading.

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  10. Thank you very much Dr. anirudh for taking time out to read and comment on my poem

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  11. Beutifully expressed the inner voice of todays youth at the same time questioning them and guiding them. Nice

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  12. Very beautiful poem Mam ! The way you have described the inner conflicts and actions of today's youth and tried to guide them through rhetoric questions is amazing! And the pictures perfectly reflect the essence of the poem !

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    1. Thank you, I'm glad you enjoyed reading it!

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