Sunday, February 12, 2017

'अंततः'


क्यों कानों में क्रूर हास्य, और चेहरे पे गांभीर्य है?
क्यों मूक है अन्तर्मन, और चीखें इतनी तीव्र हैं?

तेज़ है गति विचारों की, धीमे पड़ रहे हैं कदम,
पुकार रहे हैं पुर्ज़े मेरे, कान बहरे हैं एकदम!
बेजान सा संघर्ष है, और खोखला वजूद,
 हार शायद अब अटल हैदृढ़निष्ठा के बावजूद!

क्यों कानों में क्रूर हास्य, और चेहरे पे गांभीर्य है?
क्यों मूक है अन्तर्मन, और चीखें इतनी तीव्र हैं?

आँखें मेरी हैं देख रहीं, एक हस्ती को गिरते हुए,
आँधियों से भिड़ने वाले को, धूल में मिलते हुए!
आत्मा भी निंदा कर रही, निरर्थक प्रयासों की,
जिनमें केवल अस्थियाँ हैं, कई सारी मन्षाओं की!

क्यों कानों में क्रूर हास्य, और चेहरे पे गांभीर्य है?
क्यों मूक है अन्तर्मन, और चीखें इतनी तीव्र हैं?
सिरहाने बैठी मौत है, टाक रही एकटक है,
लेने आयी जो शेष है, सिरहाने बैठी मौत है...













(The author does not own copyright of any picture. Pic courtesy: internet)

Sunday, August 23, 2015

तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो ... ~Fundamental confusion of the Indian youth

तुम हो... कुछ हो!
दरिया है तुम्हारे अंदर, साँसों में तूफ़ान है,
खून खौलता लावा, मर-मस्तिष्क में बवाल है!
भवंडर हैं कदम कदम पर और खुद ही से जूझते हो?
क्यों  किसी की विचार-धाराओं में अस्तित्व अपना ढूँढ़ते  हो?
क्रांति क्रांति चिल्लाते हो...
शांति की आशा भी रखते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!

किसने बेड़ियाँ बाँधी तुम पे, तुमने और कितनों पे बाँधी?
संस्कृति की बातें सुनायीं बहुत, और सभ्यता पे रोक लगायी?
बदलाव की बातें करते हो, कहाँ जा कर बसते हो!
कौनसी सत्ता, कैसे नारे, किसको दिनभर कोसते हो?
गंदगी में पैर रखते हो...
फिर पैर को साफ करते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!

कौन गुरु, कपटी कौन, कौन भगवान ज्ञात नहीं!
रखना तो है किसी पे विश्वास, फिर आत्मविश्वास क्यों नहीं!
है इन्सानियत इतनी दुर्लभ, कि जिसने दिखाई भगवान है,
बाकी या तो बेरहम, या बेरहमी से परेशान हैं!
डर पैदा करते हो...
उसी डर से रुक जाते हो...
तुम कभी कभी समझ नहीं आते हो!



















(The author does not own copyright of any picture. Pic courtesy:internet)

Sunday, September 14, 2014

भाषा की परिभाषा


कोई आँसुओं से सुनाये गाथा, कोई खुशियों भरे स्वर है गाता!
और एक तुम- हाथ जोड़े बोल रहे हो, "भाषा यह हमको नहीं आता"!
जुड़ जायेंगे शब्द कहीं, तुम व्यक्त करने का प्रयास करो,
क्यों कोस रहे हो जगह-धर्म-जात को, भाषा बनेगी तुम बात करो!

देखो माँ गीत गुनगुना के, बच्चे को अपने सुला रही,
न समझे बोल वह नन्ही जान, पर माँ से उसको गिला नहीं!
भावना जानवर भी समझ लेते हैं, तुम तो इन्सान हो, नाज़ करो,
परिवार है यह भी तुम्हारा, भाषा बनेगी तुम बात करो!

जब आतंक छा जाता है, या व्याधि से शरीर बंध जाता है,
ख़ुशी आसमान छूं लेती है जब, या गरीबी से जीवन लद जाता है,
क्या बनती है बंधन भाषा तब? इस तथ्य पर विचार करो!
मिट जाने दो भेद सारे, भाषा बनेगी तुम बात करो!
ख़ुशी और दर्द का इज़हार करो... भाषा बनेगी तुम बात करो! :)







इन्सान ने भाषा बनायीं है.. पर भाषा इन्सान की पहचान नहीं हो सकती! आज १४ सितंबर, 'हिन्दी दिवस' है| हिन्दी सुंदर भाषा है, और मेरी सबसे प्रिय भाषा! हर भाषा सुन्दर है और शब्दों को तथा इन्सानों को जोड़ना ही किसी भी भाषा की असली परिभाषा है! 

Thursday, July 24, 2014

~Swargaza (English)


Hindi is my first love. Yes, I mean it! And this blog is a dedication to my Hindi teacher and is exclusively for Hindi content. The last poem I wrote- 'SWARGAZA'- got a very good response in certain communities, something I had never imagined. A group of doctors working at very good positions in the field of Public Health (which also happens to be my area of specialization) offered to send this poem to health professionals working in Gaza  for its message and impact, provided I translate it to English, as the populations there read primarily Arabic and English. The message is to see truth as it is, to end war, spare innocent lives and understand that an eye for an eye can make the whole world go blind! I hope these words reach far and wide and bring about a positive change in some corners of the world.

Hence, I choose to translate it to English and feature it on my blog as an exception. A request to those sharing this poem- do not violate the copyrights. A lot of effort goes in writing the posts. Thank you.



Wednesday, July 23, 2014

~स्वर्गाज़ा




मैं भूखा हूँ यह सच है, तुम भी भूखे हो यह सच है|
मुझे जीने की प्यास मार रही, तुम्हें जीतने की यह सच है|
गुनाहों से न मिटती है सत्ता की भूख, क्या यह तुमको ज्ञात नहीं?
काया को मेरी तुम निचोड़ रहे हो, क्या यह सच्ची बात नहीं?

अस्त्र तुम्हारे प्राणों से बड़े, जो मार दिए कितने बच्चे-बूढ़े,
करने जयजयकार अब तुम्हारी, देखो कितने हैं शरीर पड़े!
कहीं खून की बाढें, तो गिरी बारूद की बरसातें कहीं!
ग़म किसी मौत का तुम्हें भी था, क्या यह सच्ची बात नहीं?

क्या अंतर तुम में-मुझ में, और ख़ुदा में तुम्हारे-मेरे?
डर रूह पे दीमक है बना, आतंक ने घरों में बनाये हैं बसेरे!
सीमाएँ देशों की बदल के, स्वर्ग तुम जाओगे सही...
पर मिलोगे उन्ही बेकसूरों को वहाँ... क्या यह सच्ची बात नहीं??


झाँको अपनी रूह के अंदर... बोलो, यह सच्ची बात नहीं?




#WednesdayWordplay is a poem-series in which readers send me a topic, a line, a picture or simply anything, which I complete/ interpret my way and present my interpretations through poetry! The idea is to present a perspective that is different from the reader's through interactive poetry.

This week's #WednesdayWordplay  theme was given to me by my colleague, Dr. Navneet Kaur Sandhu. Dr. Navneet is pursuing MD in Community Medicine and is very passionate about serving the lesser fortunate sections of the society. The word was 'truth' and she spoke to me about how people create different 'versions' of truth and use those to fulfill their vested interests. I used this central theme to portray the war-situation in Gaza Strip and sensitize readers of my blog to issues of terror, war and peace.

Note: The title 'Swargaza' is a word I invented myself. It could mean 'swa (self) as in 'Gaza herself', or 'swar' (voice, tone) of Gaza or swarg as in 'the heaven, Gaza'. In poetry, when the poet cannot find an appropriate word, he/she has the freedom to create words like these relevant to the theme. Suggestions and criticism is welcome and ideas for the next #WednesdayWordplay poem are invited too.  Please post your comments in the space below.












Wednesday, May 7, 2014

अलविदा!



वह आयी...
उसे जाना पड़ा था
किसी के बारे में खुद को,
समझाना पड़ा था...

उसने देखा कमरे में,
चादर ओढ़े वह सो रहा था
उन दोनों के कमरे में
वह अकेला सो रहा था...

चप्पलें पहन के ही वह
कमरे के अंदर आयी,
पसंद नहीं थी जो बात उसको,
आज ध्यान में ही ना आयी!

मेज़ पे पड़ी चित्रों की किताब,
हाथ में उसने उठायी..
रंगीन पैन्सिल मिली उसे
उससे ही वह लिख आयी-

"मुझे पता है,
तुम सब जानते हो!
मेरी ज़रूरतों को
सही पहचानते हो...

ज़िन्दगी कभी भी रूकती नहीं,
और तुम भी कभी ना रुकना,
कभी होठों पे जो चूमा था तुमको
उसे ही मेरा आखिरी समझना!"

*************************************************

वह आया...
उसी मेज़ पर बैठा
दो चाय ऑर्डर कर के,
सोचता वहीँ पर बैठा...

उसने सोचा, प्यार मिला
एक सुंदर स्त्री का साथ मिला...
कितना रहता था अकेले मैं,
पकड़ने के लिए एक हाथ मिला.

मेज़ पे उसने बैग रखी,
आज वक़्त पे वह आयी थी,
तोहफे माँगनेवाली आज खुद
एक तोहफा बन कर आयी थी...

"बता दिया?"
"हाँ, चिट्ठी छोड़ आयी हूँ.."
"कब तक रहोगी?"
"मैं...घर छोड़ आयी हूँ..!"

"मैं सोच रहा था... सब की कितनी
आशाएँ हम से होती हैं,
और साथ निभाने की,
वजहें कितनी होती हैं..."

चूम कर उसने वह गोरा-सा हाथ,
कहा, "शुक्रिया, हसीन साथ के लिए...
पर इसे मेरा अलविदा समझना,
उसी, चिठ्ठी वाली बात के लिए!"



#WednesdayWordplay is a poem-series in which readers send me a topic, a line, a picture or simply anything, which I complete/ interpret my way and present my interpretations through poetry! The idea is to present a perspective that is different from the reader's through interactive poetry.



This week's #WednesdayWordplay idea- the topic: "The last kiss... before they parted forever" was contributed by someone I really look up to- my sister, the eldest and the wisest in my twitter-gifted girl-gang, a physician practising in Mumbai, Dr. Priyanka (tweets awesome stuff as @SatanKiNani). Pri, I hope I have done justice to the topic you sent, and presented it in a way different from what you thought? Send in your ideas to me, the next poem could be based on what you send! :-)

Wednesday, April 16, 2014

ईश्वर का पुनर्जन्म

विकट यह युग है, मन विश्वास करने से है डरता...
भूख-प्यास, हिम-धूप में की हुई, तपस्याओं का फल नहीं मिलता!
ना यज्ञ-पूर्ति से प्राप्ति होती, ना गंगा धोती पाप है,
ना चिरंजीव रहता अब कोई, ना राख करता श्राप है!
समस्त विश्व के ऋषि-मुनि, मिले करने एक गंभीर चर्चा...
आखिर कब दिखेंगे ईश्वर... क्या निरर्थक सारी पूजा-अर्चा?
क्यों यह हो रहा...मति सीमित लगने लगी...
ईश्वर के अस्तित्व के प्रति, जिज्ञासा मन में जगने लगी!

क्या प्रकोप यह उसी ईश्वर का? और अंधकार संपूर्ण जगत में...
या सदियों का अंधविश्वास, अथवा कपट मुनिलोक पे?
व्यर्थ गयी शिक्षा सारी, बोले मुनिवर निराशा से,
कितना कुछ करते रहे, बस इसी एक आशा से...
दर्शन, पुण्य, वरदान मिलेगा, और सुंदर, सफल जीवन भी,
कितने सारे किये अभिषेक.. जाप, याचना और नमन भी!
लगता है यह मृत्यु है... श्रद्धा और विश्वास की,
भक्ति तो अब निंदा है, झूठ है प्राप्ति स्वर्गवास की!

लेकिन सभा शांत न थी, 'किन्तु-परन्तु' उठने लगे,
विचार धाराएँ बनने लगीं, समूहों में सभासद जुटने लगे...
कुछ बोले अब सेवा से ही, ईश्वर का स्वरूप ज्ञात होगा,
कोई बोला अंतरिक्ष से ही, इस बात का जवाब प्राप्त होगा!
कोई बोला लानत है, आज तक हमको झुठलाया गया,
मान-भिक्षा-शिष्य पाने के लिए, अनजानी बातों से उलझाया गया!
कोई मंदिर तोड़ने कोई ज़मीन खोदने में मग्न हुआ,
मानव-मन की इस खोज के बीच, ईश्वर का पुनर्जन्म हुआ!




#WednesdayWordplay is a poem-series in which readers send me a topic, a line, a picture or simply anything, which I complete/ interpret my way and present my interpretations through poetry! The idea is to present a perspective that is different from the reader's through interactive poetry.


This week's #WednesdayWordplay theme 'existence of God' and not knowing whether to have faith in God' was contributed by Mrs.Aruna (on twitter as @Arunapk57). Mrs.Aruna is a mother of two and a brave lady fighting cancer...with a smile! Her tweets  inspire me and I pray for a happy life and a healthy recovery for her! If you have ideas for my #WednesdayWordplay series, write in to me or leave a comment here, the next poem could be based on what You send! ;)